क्या वाकई अमेरिका के पास हथियार खत्म हो रहे हैं

क्या वाकई अमेरिका के पास हथियार खत्म हो रहे हैं

पेंटागन के बंद कमरों में इन दिनों एक अलग ही हलचल है। ईरान के साथ चले हालिया संघर्ष ने महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका के हथियारों की ऐसी खपत की है जिसकी उम्मीद खुद रक्षा योजनाकारों को नहीं थी। हालत यह है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को देश के प्राइवेट सेक्टर और ऑटोमोबाइल कंपनियों तक को हथियारों के उत्पादन में कूदने के लिए कहना पड़ रहा है।

अक्सर माना जाता है कि अमेरिकी सेना के पास कभी गोला-बारूद की कमी नहीं हो सकती। यह धारणा अब टूट रही है। ईरान के खिलाफ जंग में अमेरिका ने पानी की तरह मिसाइलें और बम बरसाए हैं। सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) की हालिया रिपोर्ट ने इस हकीकत को पूरी दुनिया के सामने लाकर रख दिया है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका ने अपनी पैट्रियट (Patriot) एयर डिफेंस इंटरसेप्टर मिसाइलों और थाड (THAAD) मिसाइलों का लगभग आधा स्टॉक इस संघर्ष में फूंक दिया है।

ईरान संघर्ष ने खाली किए पेंटागन के गोदाम

जंग कभी भी सस्ती नहीं होती लेकिन आधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम के मामले में यह बात और ज्यादा भारी पड़ती है। ईरान और उसके समर्थित गुटों द्वारा दागे गए ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में मार गिराने के लिए अमेरिका ने अपने सबसे महंगे इंटरसेप्टर इस्तेमाल किए। पैट्रियट मिसाइल का एक राउंड ही लाखों डॉलर का आता है।

ट्रंप ने खुद फ्रांस में G7 शिखर सम्मेलन के दौरान स्वीकार किया कि जंग के आखिरी दिन बेहद भीषण थे। उन्होंने बताया कि केवल दो दिनों में ही 200 मिलियन डॉलर मूल्य के बम इस्तेमाल कर दिए गए। यह खर्च सिर्फ कागजी नहीं है। इसने अमेरिकी सेना के गोदामों में सीधा डेंट मारा है। प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल (PrSM) का भी लगभग 45 फीसदी स्टॉक खत्म हो चुका है।

समस्या सिर्फ स्टॉक खत्म होने की नहीं है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि इन्हें दोबारा बनाने में सालों का वक्त लगेगा। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों और पैट्रियट इंटरसेप्टर के भंडार को युद्ध से पहले वाले स्तर पर लाने में कम से कम तीन से चार साल का समय लग सकता है।

डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट और डोनाल्ड ट्रंप का नया दांव

डोनाल्ड ट्रंप इस स्थिति को हाथ पर हाथ धरकर देखने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने शीतयुद्ध के जमाने के एक पुराने कानून डिफेंस प्रोडक्शन एक्ट (DPA) को लागू कर दिया है। इस कानून के तहत अमेरिकी सरकार निजी कंपनियों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट्स को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर कर सकती है।

ट्रंप प्रशासन ने साफ किया है कि देश के म्यूनिशन इंडस्ट्रियल बेस में कई तरह की अड़चनें हैं। सप्लाई चेन बेहद कमजोर हो चुकी है और कंपनियों के पास तुरंत उत्पादन बढ़ाने की क्षमता नहीं है। इसी को दुरुस्त करने के लिए ट्रंप ने फोर्ड (Ford) और जनरल मोटर्स (General Motors) जैसी बड़ी कार निर्माता कंपनियों को भी सैन्य उपकरण और मिसाइल पार्ट्स बनाने की प्रक्रिया में शामिल होने का संकेत दिया है। रूस ने इसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था का सैन्यीकरण (Militarization) करार दिया है। लेकिन वॉशिंगटन के पास शायद इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है।

ट्रंप ने हाल ही में वाइट हाउस में लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन (RTX) जैसी दिग्गज डिफेंस कंपनियों के अधिकारियों के साथ आपातकालीन बैठक भी की है। वे चाहते हैं कि प्रोडक्शन की रफ्तार को तुरंत दोगुना किया जाए।

चीन के खिलाफ क्या कमजोर पड़ रहा है अमेरिका

पेंटागन के अधिकारी इस बात से सबसे ज्यादा परेशान हैं कि अगर ईरान के चक्कर में उनके गोदाम खाली हो गए तो पश्चिमी प्रशांत महासागर में चीन का मुकाबला कैसे होगा। रक्षा रणनीतिकार मानते हैं कि चीन साल 2027 तक ताइवान पर सैन्य कार्रवाई की क्षमता हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है।

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अगर ताइवान को लेकर कोई बड़ा टकराव होता है, तो अमेरिका को इन्हीं पैट्रियट, थाड और टॉमहॉक मिसाइलों की जरूरत पड़ेगी। सीएसआईएस (CSIS) के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मिसाइलों के मौजूदा संकट ने प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के लिए एक बड़ी कमजोरी की खिड़की (Window of vulnerability) खोल दी है।

यूक्रेन की मुसीबतें भी इससे कम नहीं होने वालीं। यूक्रेन लंबे समय से ट्रंप प्रशासन से और अधिक पैट्रियट मिसाइलों की मांग कर रहा है। लेकिन जब अमेरिका के अपने गोदाम खाली हैं, तो वह सहयोगियों को कितनी मदद दे पाएगा, इस पर बड़ा सवालिया निशान लग गया है। अमेरिकी रक्षा विभाग अब अपने खुद के स्टॉक को प्राथमिकता दे रहा है।

आगे का रास्ता और व्यावहारिक कदम

इस पूरे संकट से निपटने के लिए ट्रंप प्रशासन को अब बहुत तेजी से कुछ बड़े फैसले लेने होंगे। कागजी दावों से अलग जमीन पर काम करने की जरूरत है।

सबसे पहले तो अमेरिकी कांग्रेस को बिना किसी देरी के डिफेंस एप्रोप्रिएशन बिल को पास करना होगा। जब तक बजट को मंजूरी नहीं मिलती, तब तक कंपनियों के साथ किए गए फ्रेमवर्क एग्रीमेंट सिर्फ फाइलों में दबे रहेंगे। कंपनियों को भारी निवेश के लिए पक्के कॉन्ट्रैक्ट्स की गारंटी चाहिए।

दूसरा कदम सप्लाई चेन को अमेरिका के भीतर ही मजबूत करना होगा। रक्षा उपकरणों के लिए जिन कच्चे मालों या सेमीकंडक्टर चिप्स पर दूसरे देशों पर निर्भरता है, उसे खत्म करना होगा। ऑटोमोबाइल क्षेत्र की कंपनियों को डिफेंस प्रोडक्शन में शामिल करने के लिए टेक्निकल ट्रेनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट तुरंत मुहैया कराना होगा।

पेंटागन को यह भी समझना होगा कि सस्ते ड्रोन से निपटने के लिए करोड़ों डॉलर की मिसाइलें दागना समझदारी का सौदा नहीं है। उन्हें भविष्य के युद्धों के लिए कम लागत वाले डिफेंस सिस्टम पर अपना ध्यान केंद्रित करना ही होगा।

SP

Stella Parker

Stella Parker is a prolific writer and researcher with expertise in digital media, emerging technologies, and social trends shaping the modern world.