हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब का संघर्ष क्यों नहीं थम रहा

हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब का संघर्ष क्यों नहीं थम रहा

पश्चिम एशिया की राजनीति में तनाव का नया दौर शुरू हो चुका है[cite: 1]. यमन के हूती विद्रोहियों ने एक बार फिर सऊदी अरब की सैन्य ताकत और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को सीधे तौर पर निशाना बनाया है[cite: 1]. इस बार का हमला इस बात की गवाही देता है कि कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद दोनों देशों के बीच खटास कम नहीं हुई है[cite: 1]. हूती नेता अब्दुल-मलिक बद्र अल-दीन अल-हूती ने साफ कर दिया है कि उनके ड्रोन और मिसाइलें लगातार सऊदी ठिकानों पर बरस रही हैं[cite: 1].

क्यों सुलग रही है यमन और सऊदी की सीमा

साल 2014 के आखिरी दिनों से यमन में जिस राजनीतिक संकट की शुरुआत हुई थी, वह आज भी क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है[cite: 1]. हूती विद्रोहियों ने जब सना और उत्तरी यमन के बड़े हिस्से पर कब्जा जमाया, तो चीजें पूरी तरह बदल गईं[cite: 1]. इसके जवाब में मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने दखل दिया[cite: 1]. मकसद साफ था कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को बचाया जाए[cite: 1]. लेकिन इस लड़ाई का अंत दूर-दूर तक नजर नहीं आता[cite: 1].

ईरान का समर्थन हूती गुटों के साथ है, जबकि यमन की सेना को रियाद की तरफ से मदद मिलती है[cite: 1]. यह प्रॉक्सी वॉर अब सीधे तौर पर खाड़ी देशों के बुनियादी ढांचे पर भारी पड़ रही है[cite: 1].

आरोपों और प्रत्यारोपों का दौर

ताजा हमलों के बाद दोनों तरफ से बयानों की बौछार हो रही है[cite: 1]. अल-हूती का आरोप है कि सऊदी अरब अपनी जमीनी विफलताओं को छुपाने के लिए प्रोपेगैंडा फैला रहा है[cite: 1]. उनका कहना है कि रियाद अपनी सैन्य नाकामियों की भरपाई के लिए झूठ का सहारा लेता है और दुनिया भर से समर्थन जुटाने की कोशिश करता है[cite: 1].

दूसरी तरफ, सऊदी प्रशासन ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है[cite: 1]. रियाद का दावा रहा है कि हूती विद्रोहियों ने पवित्र शहर मक्का की तरफ भी ड्रोन दागे थे[cite: 1]. लेकिन हूती नेतृत्व ने इस आरोप को सिरे से खारिज करते हुए इसे एक घिनौना झूठ बताया है[cite: 1]. उनका दावा है कि मक्का को निशाना बनाने जैसी कोई हरकत उनके द्वारा नहीं की गई है और यह सिर्फ जनता को भड़काने का एक पैंतरा है[cite: 1].

तेल के ठिकानों पर मंडराता खतरा

सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था की रीढ़ उसके तेल ठिकाने हैं[cite: 1]. जब भी हूती विद्रोही इन ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाते हैं, वैश्विक बाजार में हलचल मच जाती है[cite: 1]. सुरक्षा एजेंसियों के लिए इन हमलों को रोकना एक बड़ी चुनौती बन चुका है[cite: 1]. आधुनिक डिफेंस सिस्टम होने के बावजूद ड्रोन और मिसाइलों के छोटे और तेज حملों को पूरी तरह बेअसर करना आसान नहीं होता[cite: 1].

यह संघर्ष केवल दो देशों की सीमा तक सीमित नहीं है[cite: 1]. इसका असर पूरी वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ता है[cite: 1]. जब तक कूटनीतिक स्तर पर कोई ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक इस तरह के हमलों की आशंका बनी रहेगी[cite: 1]. यमन की जमीन पर सुलग रही यह आग कब विकराल रूप लेगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा[cite: 1].

NW

Nora Wang

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